Thursday, November 20, 2008

चुनाव में मुद्दों का अभाव

इस समय देश में छह राज्यों में विधान सभा के चुनाव हो रहे है और सब जगह एक बात सामान्य है की हर जगह आरोप- प्रत्यारोप की राजनीति चरम पर है। किसी भी राजनितिक दल के पास कोई मुद्दा नही है ,सभी एक- दूसरे पर कीचड़ उछालने में लगे हुए है । अभी हाल ही में अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव हुए है और जिस तरह के स्वस्थ माहौल में वहा पर चुनाव हुए है क्या हम उस तरह के माहौल में चुनाव नही कर सकते है । देश में गरीबी, भुखमरी , बेरोजगारी , अशिक्षा जैसे न जाने कितने गंभीर मुद्दे है लेकिन कोई भी दल इनको मुद्दा नहीं बना रहा है, आख़िर क्यों, ये समझ से परे है। आज साठ साल हो गया आजाद हुए लेकिन हम मानसिक रूप से अभी भी आजाद नही हो पाए है । जिस देश में ८० करोड़ से ज्यादा लोग सिर्फ़ २० रुपया प्रतिदिन कमाते हो उस देश की तस्वीर कितनी भयावह होगी ,इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। वाकई इस देश और यहाँ के नागरिको की तारीफ करनी होगी क्योंकि उनकी तरफ़ से आज तक कोई बड़ा आन्दोलन नही हुआ। बच्चो में कुपोषण एक गंभीर समस्या है लेकिन इसके लिए सरकारी प्रयास नाकाफी ही सिद्ध हुए है। इस मामले में हम कुछ अफ्रीकी देशों से भी बदतर स्थिती में है। भारत में जिस तरह से अरबपतियों की संख्या बढ़ी है उसके मुकाबले गरीबों की संख्या कई गुना बढ़ गई है। समझने वाली बात है की तीन चौथाई संस्सधानो का प्रयोग एक चौथाई लोग कर रहे है और फिर सरकार भी इन्ही के बारे में सोचती है। हाँ तो बात चुनाओं की हो रही थी ,तो मेरा बस इतना कहना है की जनता और ब्यापक हित को चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए और इस घटिया राजनीति का परित्याग जितनी जल्दी हो कर देना चाहिए। क्योंकि अगर देश की जनता ही सुखी नही है तो फिर कैसा लोकतंत्र और कैसी राजनीति । जय हो नेताओं की......जय राम जी की .फिर मिलते है.........................

2 comments:

Jimmy said...

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उमेश कुमार said...

chunav men muddon ki kami nahi hoti hai. mudden to bana liye jate hai. gandi rajniti ki yh pahli pahchan hai